JEE AAIAAN NOOO...

...ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੀ ਫੁਲਵਾੜੀ ....

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Thursday, 15 December 2011

रात आप सपने में आए ;

 

रात आप सपने में आए ;
पलकों की कुटिया के नीचे
रखा आप को गले लगाए
रात आप सपने में आए.

-०-०-०-०-०-
आप थे ,मैं था,सांवली चुप थी
रात सलोनी सी गुपचुप थी ;
रात गई कर तारा तारा

आप में हम तो रहे समाए 
रात आप सपने में आए ;

-०-०-०-०-०--०-०-
पूनम रात में पूनम चाँद ही
था पहलू में मेरे लेटा
बदल ओट से पूनम चाँद ने
मेरे पूनम चाँद को देखा ;
देखा ,देख देख शर्माए
रात आप सपने में आए ;

-०-०-०-०-०-०-०-
 चन्दन चन्दन सब मनभावन
कंचन कंचन बदन सुहावन
तन कंचन व् मन चन्दन सा
सुकुचाते से तुम थे आए
रात आप सपने में आए ;
-०-०-०-०-०-०-०-
दीप जीरवी


रात आप सपने में आए ;

 

रात आप सपने में आए ;
पलकों की कुटिया के नीचे
रखा आप को गले लगाए
रात आप सपने में आए.

-०-०-०-०-०-
आप थे ,मैं था,सांवली चुप थी
रात सलोनी सी गुपचुप थी ;
रात गई कर तारा तारा

आप में हम तो रहे समाए 
रात आप सपने में आए ;

-०-०-०-०-०--०-०-
पूनम रात में पूनम चाँद ही
था पहलू में मेरे लेटा
बदल ओट से पूनम चाँद ने
मेरे पूनम चाँद को देखा ;
देखा ,देख देख शर्माए
रात आप सपने में आए ;

-०-०-०-०-०-०-०-
 चन्दन चन्दन सब मनभावन
कंचन कंचन बदन सुहावन
तन कंचन व् मन चन्दन सा
सुकुचाते से तुम थे आए
रात आप सपने में आए ;
-०-०-०-०-०-०-०-
दीप जीरवी


Sunday, 11 December 2011

महक उठेगी रात की रानी

महक उठेगी रात की रानी

तेरी वेणी में सज कर ही.

चंदनिया शीतल हो गी पर

तेरी काया से लग कर ही .





सुमन सुशोभित हों उप वन में

तेरे आँचल के छूते ही

मानस तल पर विविध छटाएं

बिखरें तुम को छू पल भर ही .



मन मयूर करे नृत्य सुहाना

पुलकित होता हर्षाता है

जब छाते हैं कुंतल

बस तेरे मुख के नभ पर ही



मन की सीमा से आगे भी

देखो कई असीम गगन हैं

सोच विहग है आतुर पल पल

मेरा मन सुख के पथ पर ही .

दीप ज़ीरवी 9815524600

महक उठेगी रात की रानी

महक उठेगी रात की रानी

तेरी वेणी में सज कर ही.

चंदनिया शीतल हो गी पर

तेरी काया से लग कर ही .





सुमन सुशोभित हों उप वन में

तेरे आँचल के छूते ही

मानस तल पर विविध छटाएं

बिखरें तुम को छू पल भर ही .



मन मयूर करे नृत्य सुहाना

पुलकित होता हर्षाता है

जब छाते हैं कुंतल

बस तेरे मुख के नभ पर ही



मन की सीमा से आगे भी

देखो कई असीम गगन हैं

सोच विहग है आतुर पल पल

मेरा मन सुख के पथ पर ही .

दीप ज़ीरवी 9815524600

Tuesday, 15 November 2011

तेरी तस्वीर में शोखी , अदा है बलवा है ;


तेरी तस्वीर में शोखी , अदा है बलवा है ;
और तुझ में वफा है मुहब्बत का जलवा है
तेरी तस्वीर की रंगीनिया खो जाएँ भी;
उम्र का असर मुहब्बत पे न हो पाए गा;
हो गी ये नौजवान बरस बरस बीतें गे ,
हो गी ये नौजवान सरस सरस भीगें गे ;
'दिल नगर' आ के जरा देख लो अहिस्ता से
अपने रहने की जगह कितनी है शाइस्ता ये .
ख्वाब शीशे से भी नाज़ुक से हुआ करते है ;
इसलिए तुम से ये कहने से हम डरते हैं .
मेरी इस बात से वो ऐसे खफा न हो जाए ;
मेरी उस बात से वो  वैसे खफा न हो जाए.
अब तो उस के सिवा मैं  जाऊं भी कहाँ जाऊं
वो नजर आए है मुझ को जाऊं मैं जहाँ जाऊं   
 तेरी तस्वीर में शोखी , अदा है बलवा है ;
और तुझ में वफा है मुहब्बत का जलवा है
दीप जीर्वी 9815524600

तेरी तस्वीर में शोखी , अदा है बलवा है ;


तेरी तस्वीर में शोखी , अदा है बलवा है ;
और तुझ में वफा है मुहब्बत का जलवा है
तेरी तस्वीर की रंगीनिया खो जाएँ भी;
उम्र का असर मुहब्बत पे न हो पाए गा;
हो गी ये नौजवान बरस बरस बीतें गे ,
हो गी ये नौजवान सरस सरस भीगें गे ;
'दिल नगर' आ के जरा देख लो अहिस्ता से
अपने रहने की जगह कितनी है शाइस्ता ये .
ख्वाब शीशे से भी नाज़ुक से हुआ करते है ;
इसलिए तुम से ये कहने से हम डरते हैं .
मेरी इस बात से वो ऐसे खफा न हो जाए ;
मेरी उस बात से वो  वैसे खफा न हो जाए.
अब तो उस के सिवा मैं  जाऊं भी कहाँ जाऊं
वो नजर आए है मुझ को जाऊं मैं जहाँ जाऊं   
 तेरी तस्वीर में शोखी , अदा है बलवा है ;
और तुझ में वफा है मुहब्बत का जलवा है
दीप जीर्वी 9815524600

Sunday, 6 November 2011

अपना और पराया मौन:

अपना और पराया मौन:
अकुलाया अकुलाया मौन.
जीवन यज्ञ आहुति श्वास ;
धडकन मन्त्र बनाया मौन .
बोलना पीतल;यह सोना है ;
जो हम ने अपनाया मौन .
कभी सुहाग सेज पे लेटा;
शर्माया, सुकुचाया मौन.
कभी विरहाग्नि ने जी भर ;
तरसाया तरपाया मौन.
तिल तिल पलपल ही जीवनभर
देता साथ सुहाया मौन .
प्रेम पगी मीरा का मोहन ;
प्रेम गगन पर छाया मौन .
नाव की ठांव बना कबहूँ यह ;
कबहूँ पतवार बनाया मौन .
श्वासों की माला पे हमने ;
हर दिनरात फिराया मौन

दीप जीरवी

अपना और पराया मौन:

अपना और पराया मौन:
अकुलाया अकुलाया मौन.
जीवन यज्ञ आहुति श्वास ;
धडकन मन्त्र बनाया मौन .
बोलना पीतल;यह सोना है ;
जो हम ने अपनाया मौन .
कभी सुहाग सेज पे लेटा;
शर्माया, सुकुचाया मौन.
कभी विरहाग्नि ने जी भर ;
तरसाया तरपाया मौन.
तिल तिल पलपल ही जीवनभर
देता साथ सुहाया मौन .
प्रेम पगी मीरा का मोहन ;
प्रेम गगन पर छाया मौन .
नाव की ठांव बना कबहूँ यह ;
कबहूँ पतवार बनाया मौन .
श्वासों की माला पे हमने ;
हर दिनरात फिराया मौन

दीप जीरवी

Thursday, 3 November 2011

आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?



आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?
महंगा बिकने की खातिर ?
अलग सा दिखने की खातिर ?
वाह वाह ,वाह वाह पाने को?
कोई दिल धड़काने को ?
आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०--०--०-
चौकी दारा करने को ?,
धारा के उलट चलने को ?
इन्कलाब सा लाने को ?
पद प्रतिष्ठा पाने को?
आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?
-०-०-०-०-०-००-०--०--०-०-०-
अख़बारों में छपने को ?
दरबारों में घुसने को?
या फिर ईनामों की खातिर ;
ये जोड़ तोड़ तिकडम जी भर .
आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-००-०
या दिल की दुनिया का  हाकम;
दिल करता है हम पर शासन.
उसका हर हुकुम बजाने को
लिखते हैं हम जी जाने को?
आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
दीप जीरवी

आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?



आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?
महंगा बिकने की खातिर ?
अलग सा दिखने की खातिर ?
वाह वाह ,वाह वाह पाने को?
कोई दिल धड़काने को ?
आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०--०--०-
चौकी दारा करने को ?,
धारा के उलट चलने को ?
इन्कलाब सा लाने को ?
पद प्रतिष्ठा पाने को?
आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?
-०-०-०-०-०-००-०--०--०-०-०-
अख़बारों में छपने को ?
दरबारों में घुसने को?
या फिर ईनामों की खातिर ;
ये जोड़ तोड़ तिकडम जी भर .
आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-००-०
या दिल की दुनिया का  हाकम;
दिल करता है हम पर शासन.
उसका हर हुकुम बजाने को
लिखते हैं हम जी जाने को?
आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
दीप जीरवी

Sunday, 29 November 2009

{ नज्म }दीप ज़िरवी

दीप  ज़िरवी

तन्हाई का कैसा यारो फंडा

तन्हाई का कैसा यारो फंडा
कोई कैसे तन्हा भी हो सकता है ?
फूल कही हो खुशबु उसके साथ रहे ,
खुशबू हो जो वो भी हवा के साथ बहे
खुशबु से हम सब का दामन भरता है ,
तन्हाई का कैसा यारो फंडा है ,
कोई कैसे तन्हा भी हो सकता है ?
दिल के साथ है धड़कन ,
आँख के साथ स्वप्न ,
सुखदुख साथ में मिलके बनता है जीवन ।
जीवन धार में मिलके जीवन चलता है ,
तन्हाई का कैसा यारो फंडा है ।
कोई कैसे तन्हा भी हो सकता है ?
दीप के साथ है ज्योति ,
मोती सीप में है
मीठी पीरहा देखिये गीत में है ।
कांटे फूल के साथ हैं
फूल महकता है ।
तन्हाई का कैसा यारो फंडा है
कोई कैसे तन्हा भी हो सकता है ?


--
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{ नज्म }दीप ज़िरवी

दीप  ज़िरवी

तन्हाई का कैसा यारो फंडा

तन्हाई का कैसा यारो फंडा
कोई कैसे तन्हा भी हो सकता है ?
फूल कही हो खुशबु उसके साथ रहे ,
खुशबू हो जो वो भी हवा के साथ बहे
खुशबु से हम सब का दामन भरता है ,
तन्हाई का कैसा यारो फंडा है ,
कोई कैसे तन्हा भी हो सकता है ?
दिल के साथ है धड़कन ,
आँख के साथ स्वप्न ,
सुखदुख साथ में मिलके बनता है जीवन ।
जीवन धार में मिलके जीवन चलता है ,
तन्हाई का कैसा यारो फंडा है ।
कोई कैसे तन्हा भी हो सकता है ?
दीप के साथ है ज्योति ,
मोती सीप में है
मीठी पीरहा देखिये गीत में है ।
कांटे फूल के साथ हैं
फूल महकता है ।
तन्हाई का कैसा यारो फंडा है
कोई कैसे तन्हा भी हो सकता है ?


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Wednesday, 18 November 2009

अकेला नही हूँ पर तन्हा हूँ

अकेला नही हूँ पर तन्हा हूँ

दरया होकर भी प्यासा हूँ ।

मरती चिडिया देखूं रो दूँ ,

बेशक मै सब में हंसता हूँ ।

तू सेठानी बेशक बेशक ,

मैं याचक दर पर आया हूँ ।

दाज के लिए दरवाजे पर

बैठी बेटी का पापा हूँ ।

बूढे बाप के खाली बेटे की

लाश उठाते में हाफा हूँ ।

श्वासों की हूँ आवागमन मैं

लोथ हूँ , लाश हूँ एक गाथा हूँ ।


--
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अकेला नही हूँ पर तन्हा हूँ

अकेला नही हूँ पर तन्हा हूँ

दरया होकर भी प्यासा हूँ ।

मरती चिडिया देखूं रो दूँ ,

बेशक मै सब में हंसता हूँ ।

तू सेठानी बेशक बेशक ,

मैं याचक दर पर आया हूँ ।

दाज के लिए दरवाजे पर

बैठी बेटी का पापा हूँ ।

बूढे बाप के खाली बेटे की

लाश उठाते में हाफा हूँ ।

श्वासों की हूँ आवागमन मैं

लोथ हूँ , लाश हूँ एक गाथा हूँ ।


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Sunday, 15 November 2009

...ये भी मैं हूँ वो भी मैं ही ..





ये भी मैं हूँ वो भी मैं ही ..
एक बूँद गिरी पर गिरे कभी जो मैं ही हूँ .
एक बूँद धरा पर गिरी कभी जो मैं ही हूँ .
एक बूँद अरिहंता बन गिरी समर-आँगन   में ,
एक बूँद किसी घर गिरी नवोढा नयनन से ,
एक बूँद कही पर चली श्यामल गगनन से '
एक बूँद कहीं पर मिली सागर प्रियतम से ,
वो बूँद बनी हलाहल जानो मैं ही हूँ ,
वो बूँद बनी जो सागर  जानो मैं ही हूँ,
वो बूँद बनी पावन  तन जानो मैं ही था ,
वो बूँद बनी प्यासा मन जानो मै ही हूँ .
हर बूँद बूँद में व्यापक व्याप्त मैं ही हूँ
हर बूँद का मालिक पालक बालक मैं ही हूँ .
मैं सागर बादल कमल दामिनी गंगाजल ;
मैं पर्वत गहन गम्भीर हूँ जैसे विंध्यांचल  .
बिरहन के मन की पीर से भीगा हूँ आंचल ,
मैं कुल ब्रह्मांड की बेटियों का धर्मी बाबुल .
मैं आदि अनादि मैं मध्य हूँ मैं ही हूँ अनंत ;
मै ग्रीष्म शिशिर हेमंत हूँ मै ही हूँ वसंत .
मैं बीज हूँ जड़ भी मैं ही फल फूल भी मैं .
मैं वो हूँ वो मैं ही हूँ जल कूल भी मैं .
मैं ही हूँ वर्ग पहेली ,वर्ग भी शब्द भी मैं .
मैं ही हूँ रस राग रंग का अर्थ भी मैं .
मैं जान अजान का भेद हूँ मैं ही हूँ ज्ञाता...
कुछ समझना बाकी न है , समझ भी न आता .
वो मायापति अकाल दयाल विशाल भी मैं .
वो घुटनों चलता मूढ़ मती जो बाल भी मैं
deepzirvi@yahoo.co.in


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...ये भी मैं हूँ वो भी मैं ही ..





ये भी मैं हूँ वो भी मैं ही ..
एक बूँद गिरी पर गिरे कभी जो मैं ही हूँ .
एक बूँद धरा पर गिरी कभी जो मैं ही हूँ .
एक बूँद अरिहंता बन गिरी समर-आँगन   में ,
एक बूँद किसी घर गिरी नवोढा नयनन से ,
एक बूँद कही पर चली श्यामल गगनन से '
एक बूँद कहीं पर मिली सागर प्रियतम से ,
वो बूँद बनी हलाहल जानो मैं ही हूँ ,
वो बूँद बनी जो सागर  जानो मैं ही हूँ,
वो बूँद बनी पावन  तन जानो मैं ही था ,
वो बूँद बनी प्यासा मन जानो मै ही हूँ .
हर बूँद बूँद में व्यापक व्याप्त मैं ही हूँ
हर बूँद का मालिक पालक बालक मैं ही हूँ .
मैं सागर बादल कमल दामिनी गंगाजल ;
मैं पर्वत गहन गम्भीर हूँ जैसे विंध्यांचल  .
बिरहन के मन की पीर से भीगा हूँ आंचल ,
मैं कुल ब्रह्मांड की बेटियों का धर्मी बाबुल .
मैं आदि अनादि मैं मध्य हूँ मैं ही हूँ अनंत ;
मै ग्रीष्म शिशिर हेमंत हूँ मै ही हूँ वसंत .
मैं बीज हूँ जड़ भी मैं ही फल फूल भी मैं .
मैं वो हूँ वो मैं ही हूँ जल कूल भी मैं .
मैं ही हूँ वर्ग पहेली ,वर्ग भी शब्द भी मैं .
मैं ही हूँ रस राग रंग का अर्थ भी मैं .
मैं जान अजान का भेद हूँ मैं ही हूँ ज्ञाता...
कुछ समझना बाकी न है , समझ भी न आता .
वो मायापति अकाल दयाल विशाल भी मैं .
वो घुटनों चलता मूढ़ मती जो बाल भी मैं
deepzirvi@yahoo.co.in


--
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सूरजों की बस्ती थी ,जुगनुओं का डेरा है ,
कल जहा उजाला था अब वहां अँधेरा है.
राह में कहाँ बहके ,भटके थे कहाँ से हम ,
किस तरफ हैं जाते हम , किस तरफ बसेरा है.
आदमी न रहते हों बसते हों जहां पर बुत ,
वो किसी का हो तो हो, वो नगर न मेरा है.
रहबरों के कहने पर रहजनों ने लूटा है ,
रौशनी-मीनारों पे ही बसा अँधेरा है .
मछलियों की सेवा को जाल तक बिछाया है ,
आजकल समन्दर में गर्दिशों का डेरा है.
दीप को तो जलना है,दीप तो जलेगा ही ,
रौशनी-अँधेरे का तो रहा बखेडा है

 deepzirvi@yahoo.co.in.
visit my webpage

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सूरजों की बस्ती थी ,जुगनुओं का डेरा है ,
कल जहा उजाला था अब वहां अँधेरा है.
राह में कहाँ बहके ,भटके थे कहाँ से हम ,
किस तरफ हैं जाते हम , किस तरफ बसेरा है.
आदमी न रहते हों बसते हों जहां पर बुत ,
वो किसी का हो तो हो, वो नगर न मेरा है.
रहबरों के कहने पर रहजनों ने लूटा है ,
रौशनी-मीनारों पे ही बसा अँधेरा है .
मछलियों की सेवा को जाल तक बिछाया है ,
आजकल समन्दर में गर्दिशों का डेरा है.
दीप को तो जलना है,दीप तो जलेगा ही ,
रौशनी-अँधेरे का तो रहा बखेडा है

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भ्रमर

भ्रमर
मेरा मन
पतंगे सा कोमल
भ्रमर सा चंचल
अस्थिर
पारे सम
कोशिश करे
कैद करने की
इस मन को तेरा मन
पर
पारे सम
मेरा मन
न हो सके गा स्थिर
न ही
बंदी बन पाए गा कभी
जैसे कि भ्रमर
किसी उपवन का
----
यह भ्रमर नहीं है उपवन का 
भ्रमर है ये मेरे मन का
स्वछन्द
हवा सम
स्व्त्न्त्त्र रहेगा यह
---
दीप जीर्वी


भ्रमर

भ्रमर
मेरा मन
पतंगे सा कोमल
भ्रमर सा चंचल
अस्थिर
पारे सम
कोशिश करे
कैद करने की
इस मन को तेरा मन
पर
पारे सम
मेरा मन
न हो सके गा स्थिर
न ही
बंदी बन पाए गा कभी
जैसे कि भ्रमर
किसी उपवन का
----
यह भ्रमर नहीं है उपवन का 
भ्रमर है ये मेरे मन का
स्वछन्द
हवा सम
स्व्त्न्त्त्र रहेगा यह
---
दीप जीर्वी